न्यायपथ: संकल्प, समर्पण, संघर्ष — एक नया आह्वान
8-9 अप्रैल 2028, अहमदाबाद कांग्रेस अधिवेशन के बाद की सोच अहमदाबाद अधिवेशन समाप्त हो चुका है। सभी पदाधिकारी, नेता और कार्यकर्ता इस आयोजन से नई ऊर्जा, नई प्रेरणा लेकर लौटे हैं — यह ऊर्जा सिर्फ भाषणों में नहीं, बल्कि उनके आगामी प्रयासों में दिखनी चाहिए। यह लेख उसी ऊर्जा को स्वर देने का प्रयास है, न्यायपथ के अगले अध्याय के रूप में। आपने यदि पिछला लेख "न्यायपथ: संकल्प, समर्पण, संघर्ष" पढ़ा है, तो यह उसकी अगली कड़ी है — और यदि नहीं, तो मैं आशा करता हूँ कि यह लेख आपको विचार करने पर विवश करेगा। संकल्प: हमारा पहला संकल्प है — बीते दस वर्षों में कमजोर पड़ी आर्थिक, प्रशासनिक और संवैधानिक व्यवस्था को पुनः स्थिर करना। इसे पहले से बेहतर बनाना। दूसरा संकल्प है — स्वयं से। जब देश मानसिक, शारीरिक और आर्थिक संकटों से घिरा हो, तब हमें खुद से सवाल करना होगा: क्या हम उम्मीद की लौ बन सकते हैं? देश एक ऐसे गांधी की प्रतीक्षा कर रहा है, जो हाथ बढ़ाकर उसे आशा की ओर ले चले। आज हर कांग्रेसी कार्यकर्ता को, चाहे वह पदाधिकारी हो या ज़मीनी सिपाही, यह संकल्प लेना होगा कि वह निजी स्वार्थ और मतभेदों को दरकिनार कर गांधीवादी विचारधारा को अपनाकर फासीवाद के खिलाफ पूरी शक्ति से लड़ेगा, और गरीबों की सरकार फिर से बनाएगा। समर्पण: हर वह व्यक्ति जो खुद को कांग्रेसी मानता है, उसे आज उस झंडे के प्रति समर्पित होना होगा — वही झंडा, जो देश के हर गरीब, कमजोर और उपेक्षित नागरिक के लिए उम्मीद का प्रतीक रहा है। आज हर कार्यकर्ता को खुद में गांधी को खोजना होगा — समर्पण के उस शिखर पर पहुंचना होगा, जहां निजी कुछ भी नहीं, सिर्फ देश हो। संघर्ष: अब समय आ गया है कि हर कार्यकर्ता ज़मीन पर उतरे। खुद से वादा करे कि जब तक इस फासीवादी शासन को सत्ता से हटाकर, लोकतांत्रिक मूल्यों की पुनर्स्थापना नहीं कर देता — तब तक चैन से नहीं बैठेगा। जब तक हर गरीब, हर उपेक्षित को उम्मीद का हाथ नहीं थमा देता — संघर्ष जारी रहेगा। ना थमेंगे हाथ तब तक, जब तक हर हाथ ना थाम लें। https://indianpoliticsnc2025sk.blogspot.com/ जय हिन्द। जय भारत।

