दिशा हीन विचार विहिन कांग्रेस
राष्ट्रीय कांग्रेस, जो कभी देश की स्वतंत्रता और निर्माण की धुरी थी, आज "दिशाहीन और विचारविहीन" अवस्था से गुजर रही है। इस संकट को समझने के लिए कुछ मुख्य बिंदुओं पर गौर करना आवश्यक है:
1. वैचारिक धुंधलका (Ideological Confusion)
कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती उसकी वैचारिक स्पष्टता का अभाव है। एक समय था जब कांग्रेस 'समाजवाद' और 'धर्मनिरपेक्षता' की स्पष्ट ध्वजवाहक थी। परंतु, वर्तमान में पार्टी कभी 'सॉफ्ट हिंदुत्व' की राह पर चलती दिखती है (जैसे मंदिर दर्शन और जनेऊ की राजनीति), तो कभी अचानक 'कठोर वामपंथ' की ओर झुक जाती है (जैसे जातिगत जनगणना और धन के पुनर्वितरण की बात)। इस वैचारिक दोहरेपन के कारण मतदाता भ्रमित रहता है कि कांग्रेस वास्तव में किसके लिए खड़ी है—बाजारवाद के लिए या कल्याणकारी राज्य के लिए?
2. नेतृत्व का संकट और 'हाईकमान' संस्कृति
पार्टी में निर्णय लेने की प्रक्रिया आज भी दिल्ली के '10 जनपथ' या राहुल गांधी के इर्द-गिर्द सिमटी हुई है। मल्लिकार्जुन खड़गे के अध्यक्ष बनने के बावजूद, महत्वपूर्ण रणनीतिक फैसले अभी भी एक छोटे से आंतरिक समूह (Coterie) द्वारा लिए जाते हैं। इससे क्षेत्रीय क्षत्रपों (Regional Satraps) को लगता है कि उनकी उपेक्षा हो रही है। जब नेतृत्व में आत्मविश्वास की कमी होती है, तो पूरी सांगठनिक मशीनरी दिशाहीन हो जाती है।
3. चुनावी नैरेटिव की कमी
भाजपा के पास 'राष्ट्रवाद', 'विकास' और 'सांस्कृतिक गौरव' का एक मज़बूत नैरेटिव है। इसके विपरीत, कांग्रेस का पूरा नैरेटिव केवल "भाजपा विरोध" या "मोदी विरोध" तक सीमित होकर रह गया है। राजनीति में केवल 'विरोध' पर्याप्त नहीं होता; जनता यह जानना चाहती है कि कांग्रेस के पास देश के लिए 'सकारात्मक विकल्प' क्या है। बिना किसी ठोस विज़न के, पार्टी केवल प्रतिक्रियावादी (Reactive) बनकर रह गई है, सक्रिय (Proactive) नहीं।
4. सांगठनिक ढांचा और ज़मीनी जुड़ाव
कांग्रेस का सांगठनिक ढांचा ऊपर से भारी (Top-heavy) है लेकिन ज़मीन पर खोखला होता जा रहा है। बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं की कमी और पुराने नेताओं का पार्टी छोड़ना यह दर्शाता है कि विचारधारा का बंधन ढीला पड़ चुका है। जब कार्यकर्ता को यह नहीं पता होता कि उसे किन आदर्शों के लिए लड़ना है, तो वह दिशाहीन महसूस करता है।
5. 2026 की चुनौतियां और अवसर
वर्तमान में (2026), जबकि देश के कई राज्यों में चुनाव हैं, कांग्रेस को अपनी "दिशाहीनता" को "दृढ़ संकल्प" में बदलना होगा। उसे केवल "संविधान खतरे में है" जैसे नारों से आगे बढ़कर आर्थिक न्याय और तकनीकी भविष्य की बात करनी होगी।
किसी भी लोकतंत्र के लिए एक मज़बूत विपक्ष अनिवार्य है। कांग्रेस को 'दिशाहीन' होने के टैग से बचने के लिए अपनी जड़ों की ओर लौटना होगा। उसे स्पष्ट करना होगा कि उसका 'आइडिया ऑफ इंडिया' 21वीं सदी की ज़रूरतों के हिसाब से क्या है। यदि वह केवल अतीत के गौरव और वर्तमान की शिकायतों के सहारे चलती रही, तो वह अप्रासंगिक होने के खतरे से बाहर नहीं निकल पाएगी।
सतीश शिव सिंह खड़का

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