उत्तराखंड: 25 वर्षों बाद भी असंतोष, क्या तीसरा विकल्प ही हल है?
उत्तराखंड को अलग राज्य बने 25 वर्ष हो गए, लेकिन क्या इस दौरान राज्य की मूलभूत समस्याओं का समाधान हुआ? पलायन, बेरोजगारी और गरीबी जैसी समस्याएँ आज भी ज्यों की त्यों बनी हुई हैं। जिन उम्मीदों के साथ राज्य का गठन हुआ था, वे अब धूमिल होती दिख रही हैं।
बेरोजगारी और पलायन: जड़ें मजबूत, समाधान कमजोर
उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों से बड़े पैमाने पर पलायन जारी है। युवाओं को रोजगार के अवसर नहीं मिल रहे, जिस कारण वे बड़े शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर हैं। सरकारी नीतियाँ या तो प्रभावी नहीं हैं या फिर उन्हें लागू करने की इच्छाशक्ति की कमी है। पर्यटन, कृषि, और स्वरोजगार को बढ़ावा देने के दावे तो बहुत किए गए, लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग है।
नेताओं की मौज, जनता का रोना
बीते 25 वर्षों में सत्ता पर बारी-बारी से कांग्रेस और भाजपा काबिज रही हैं। हर चुनाव में बड़े-बड़े वादे किए गए, लेकिन जनता को बार-बार निराशा ही हाथ लगी। सड़कों, अस्पतालों, शिक्षा और रोजगार के मोर्चे पर कोई ठोस बदलाव नहीं दिखता। सरकारें अधिकतर समय अपने राजनीतिक हित साधने में ही व्यस्त रही हैं।
क्या तीसरा विकल्प ही हल है?
राज्य की मौजूदा स्थिति को देखते हुए यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या उत्तराखंड को एक मजबूत तीसरे विकल्प की जरूरत है? आम आदमी पार्टी और कुछ क्षेत्रीय दलों ने कोशिश की, लेकिन कोई ठोस सफलता नहीं मिली। एक मजबूत क्षेत्रीय दल, जो केवल उत्तराखंड के मुद्दों पर केंद्रित हो और जनता से जुड़ा हो, राज्य की राजनीति में नया विकल्प बन सकता है।
अगर जनता को वाकई बदलाव चाहिए, तो उसे दो पारंपरिक पार्टियों से अलग हटकर किसी नए, मजबूत और उत्तराखंड-केंद्रित राजनीतिक ताकत को आगे लाना होगा। जागरूकता, सक्रिय भागीदारी और वैकल्पिक राजनीति पर ध्यान देने से ही शायद उत्तराखंड की दशा और दिशा बदल सकती है।
अब सवाल यह है—क्या जनता बदलाव चाहती है? या फिर अगले चुनावों में भी वही कहानी दोहराई जाएगी?
लेबल: उत्तराखण्ड, कांग्रेस, तीसरा विकल्प, बीजेपी, यूकेडी

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