समान नागरिक संहिता :- मेरी नजर से
समान नागरिक संहिता, अप्रैल का महीना इसी मुद्दे को लेकर आगे बढ़ा और मई का महीना पूरा इसी की चर्चा परिचर्चा में गुजरा| प्रत्येक व्यक्ति अपनी तरह से इसे परिभाषित करने और इसके लाभ गिनाने लगा, एक मजबूत और स्वस्थ लोकतांत्रिक राष्ट्र के लिए ,यह जरूरी भी है कि उस राष्ट्र का हर नागरिक, ऐसे किसी भी वाद विवाद का हिस्सा बने, जो राष्ट्र विकास में उचित और विकासशील हो|| मैं इस मुद्दे पर लिखते हुए,इसका विरोध नहीं कर रहा, कुछ विशेष बिंदुओं पर आप सबका ध्यान केंद्रित करना चाहता हूं||
समान नागरिक संहिता को समझने से पहले,हमें समझना होगा संविधान का भाग 4, जो राज्य की
नीति के निदेशक तत्व पर बात करता है|
अगर सच में सरल शब्दों में कहूं, तो यह भाग राज्य के मार्गदर्शन हेतु है, कि राज्य किन आदर्शों पर चलेगा| इसके अंतर्गत अनुच्छेद 36 से 51 आता है,
अनुच्छेद 44 " नागरिकों के लिए एक समान सिविल संहिता"
मैं भी मानता हूं कि एक बेहतर राज व्यवस्था में यह जरूरी भी है|
किंतु क्या यह एक उचित समय है इसे लागू करने का? और इससे भी बड़ा सवाल कि क्या बाकी वह सभी दिशा निर्देश पूरे हो चुके हैं,जो राज्य के लिए राज्य के नागरिक के लिए इस कानून से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है|
मुझे प्रसन्नता होती है यह कहने में की राज्य नीति निदेशक तत्वों के प्रति और खास तौर पर अनुच्छेद 44 के प्रति गंभीर है|
किंतु उससे पहले अनुच्छेद 38 कहता है कि" राज्य आय की असमानता ओं को कम करने का प्रयास करेगा, और ना के व्यक्तियों के बीच बल्कि विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले और विभिन्न व्यवसाय में लगे हुए लोगों के समूह के बीच प्रतिष्ठा सुविधाओं और अवसरों की असमानता समाप्त करने का प्रयास करेगा||
राज्य ऐसी सामाजिक व्यवस्था की जिसमें सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक न्याय राष्ट्रीय जीवन की सभी संस्थाओं को अनुप्राणित करें,"
अनुच्छेद 39 " राज्य अपनी नीति का विशिष्ट तथा इस प्रकार संचालन करेगा कि सुनिश्चित रूप से
1- पुरुष और स्त्री सभी नागरिकों को समान रूप से जीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त करने का अधिकार हो|
2- पुरुषों और स्त्रियों को समान कार्य के लिए समान वेतन प्राप्त हो|
3- बालकों को स्वतंत्र और गरिमामय वातावरण में स्वस्थ विकास के अवसर और सुविधाएं दी जाएं|
अनुच्छेद 39(क) - राज्य यह सुनिश्चित करे कि विधिक तंत्र इस प्रकार कार्य करें की समान अवसर के आधार पर न्याय सुलभ हो||
क्या अब तक सरकार इन सभी को सही तरीके से लागू कर पाई है?
क्या आपको नहीं लगता कि एक बार अगर शिक्षित महिला सेल्फ डिपेंड हो गई तो समान नागरिक संहिता स्वयं लागू हो जाएगी|
पहले राज्य का नागरिक चाहे स्त्री हो या पुरुष इतना मजबूत तो हो कि वह किसी भी परिस्थिति से लड़ सके,
महिला हिंदू मुसलमान हो या कोई और कौन चाहता है कि वह दकियानूसी नियमों और कानूनों पर चले, हमें जरूरत है उसे मजबूत कर दे, ऐसे बेहूदा दकियानूसी सदियों से चले आ रहे हैं धार्मिक अत्याचारों को वह स्वयं तोड़ देंगे, और तब समान नागरिक संहिता और ऐसे कई कानून स्वयं लागू हो जाएंगे ||
लेबल: समान नागरिक संहिता

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