क्या राज्य वास्तविक मुद्दे पर चर्चा करेगा.अन्य किसी विकल्प पर एक मत होगा.
9 नवंबर 2000 को अस्तित्व में आए 11वें पहाड़ी राज्य उत्तराखंड को 22 वां वर्ष पूरा होने को आया,पांचवा चुनावी दौर बीता और राज्य को 11वां मुख्यमंत्री मिला| यानी देखे तो एक मुख्यमंत्री ने 2 वर्ष का कार्यकाल भी नहीं बिताया,राजनीति प्रशासन पर प्रशासन राजनीति पर हावी रहा,और इस खेल में पलायन तेजी से बाहें पसारता रहा|राज्य जिन उमीदो और सपनों की नींव पर खड़ा हुआ था वह धाराशाही होता चला गया,
ऐसे में यक्ष प्रश्न यह उठता है कि आखिरकार राज्य जिन परिस्थितियों में है वह क्यों है ?
इसका जवाब छुपा है इस सवाल पर कि आखिरकार यह राज्य उत्तराखंड अस्तित्व में आया ही क्यों ?
कांग्रेस के श्रीनगर अधिवेशन 1939 में पहली बार उत्तराखंड के अलग प्रांत की मांग ने अपना मुंह उठाया और समय के साथ-साथ इस ने आंदोलन का रूप ले लिया ,1979 में उत्तराखंड क्रांति दल का गठन हुआ और इसने राज्य मांग की क्रांति को काफी आगे तक पहुंचाया ,1994 के गोली कांड और उग्र होते आंदोलन को 2 नवंबर 2000 को अपना मुकाम मिला, विकास की रफ्तार धीमी होना और पहाड़ी राज्य की परेशानियों को मैदान में बैठे शासन और प्रशासन की समझ से बाहर होना ,पहाड़ की शासन व्यवस्था पहाड़ के लोगों के हाथ हो यही मांग आंदोलन से क्रांति बनी और राज्य बनने के साथ ही सत्ता सुख लोलुपता की बलिवेदी में शहीद हो गई|
शुरुआती उठापटक के साथ ही यूकेडी धराशाई हो गई और राज्य दिल्ली में बैठे दो राष्ट्रीय पार्टियों के बीच फुटबॉल सा बन गया|पहाड़ की तस्वीर ना बदल पाई हां कई नेताओं और दलालों के साथ चतुर नौकरशाहों की जरूर चांदी हो गई ,जिस राज्य का पहाड़ी समझ के साथ चलाने की इच्छा पर गठन हुआ वह अपनी राजधानी तक पहाड़ में ना बना सका |
क्या राज्य वास्तव में पहाड़ के लोगों द्वारा पहाड़ में चलाया जा रहा है ?
इसका उत्तर देना मैं जरूरी नहीं समझता क्योंकि सबको पता है हकीकत क्या है|
जब तक राज्य जमीनी हकीकत को समझते हुए स्थानीय रूप से संगठित नहीं होता तब तक हर बहस हर बात सिर्फ बेमानी होगा ,
राष्ट्रीय पार्टी से हटकर जब तक राज्य अपनी पहचान स्वयं खडी नहीं करता राज्य की विषम परिस्थिति पर बात करना सिर्फ एक मजाकिया व्यंग होगा ,जो पिछले 22 साल से चल ही रहा है |

<< मुख्यपृष्ठ